Monday, October 5, 2009

फेला दे बाहें ...

ज़माने के लिए

नहीं हैं मेरी आहें

कोई तो समझकर

अपना

फेला दे बाहें ........

शैले "ज्वलंत"

आपका काटा तो पानी भी नहीं मांगता ..........

वह जहरीले नागों की बीबों से,
सुरक्षित निकल
आया किसी ने न तो उसे
काटा,न ही छेड़ा
होकर
आश्चर्यचिकित
उसने एक रचनाधर्मी नाग से
पूछा इसका कारण.......?रचनाधर्मी नाग ने मुस्कराते हुए कहा
आपके आगे हम कहाँ लगते
हैं हमारा काटा तो झाड़ फूकं देता है
ओझा
आपका काटा तो पानी भी नहीं मांगता.......

शैलेन्द्र सक्सेना "ज्वलंत"

++-*9963258/

Wednesday, September 30, 2009

एक वर्ग ---------------
मोसम प्यारा तेज हवा है
एक वर्ग हर्षाता है


दूर कहीं झोंपड़ मैं वेठा
एक वर्ग डर जाता है


एक वर्ग है खड़ा धूप मैं
एक वर्ग पर छाता है


एक पिए जी भर कर शरवत
एक पसीना पाता है


साँझ को डिनर,रात रस भरी
एक वर्ग पा जाता है


रुखी सूखी वासी रोटी
एक वर्ग खा पाता है


हिन्दू-मुस्लिम-सिख -ईसाई
एक खून एक नाता है


गली-गली मैं आखिर क्यों फिर
दंगा-खूं हो जाता है


ऐसी कैसी मानवता यह
समझ नहीं कुछ आता है


एक वर्ग का हिस्सा सारा
एक वर्ग खा जाता है